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स्वाभिमान
स्वाभिमान

   भोर की किरणें फूट रही थी, चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ से मेरी नींद खुल चुकी थीं । मैं सैर पर जाने के लिए जैसे ही घर से निकला, पड़ोसी भगवान दास के घर से अचानक चीख़-पुकार का करुण रुदन सुन कर किसी अनहोनी घटना की आशंका से मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उनके घर के अन्दर प्रविष्ट होते ही जो द्श्य देखा था, वो आज भी ज़ेहन में ताज़ा है । उनकी छोटी बेटी शर्मीला जो कल ही अपने ससुराल से अपने घर आई थी, ख़ून से लथपथ फ़र्श पर पड़ी तड़प रही थी । उसने अपने बायें हाथ की नस काट रखी थी, काफ़ी ख़ून बह चुका था। जल्दी से उसे नज़दीक़ के अस्पताल में ले गए थे और इस तरह एक नई ज़िन्दगी मिली थी शर्मीला को ।

अभी दो महीने पहले ही तो शर्मीला की शादी उसके अपने ही पसन्द के लड़के शुभम के साथ हुई थी । शुभम किसी कम्पनी में नौकरी करता था और शर्मीला स्नातक तक डिग्री पास करके नौकरी की तलाश में थी । दोनों आपस में बहुत प्यार करते थे । शुभम अपने माँ बाप की इकलौती सन्तान है और उसके पिता का साधारण सा बिज़नेस है। शर्मीला के पापा रिटायरड बैंक अफसर है और मम्मी भी सरकारी नौकरी में सेवारत है । शर्मीला ने घर में अपने माँ-बाप को इस बारे में बताया था और कहा था कि वे आपस में शादी करना चाहते हैं । माँ-बाप ने लड़के के बारे में छानबीन की तो उन्होंने उस लड़के को अपनी बेटी के लिए अयोग्य क़रार दिया था । उन्होंने बेटी को यह शादी न करने के लिए बहुत समझाया था, पर वो अपनी ज़िद्द पर अड़ी रही थी । एक से बड़कर एक कई रिश्ते ठुकराए थे उसने शुभम से शादी के लिए । बेटी की ख़ुशी के लिए न चाहते हुए भी माँ-बाप ने उसकी शादी अन्तरजातिक लड़के शुभम से कर दी थी ।

कहते हैं प्यार अन्धा होता है, जो अच्छे-बुरे के फ़र्क़ को पहचान नहीं पाता है । प्यार में इन्सान दिमाग की नही दिल की सुनता है । जब हम किसी के प्यार में अन्धे हो जाते हैं तो दिमाग़ सही दिशा मे सोचने की क्षमता खो देता है । शर्मीला भी ऐसे ही अन्धे प्यार की शिकार हो गई थी प्यार में सूझ-बूझ और समझदारी के साथ ही आगे बढ़ना चहिए और प्रेम विवाह करने से पहले होने वाले जीवन-साथी के बारे में ख़ुद स्पष्टीकरण करने के उपरांत अपने माँ-बाप को भी तसल्ली करने का मौक़ा देना चहिए । शर्मीला ने अपने माँ-बाप की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ फ़ैसला लेकर उन्हें शादी के लिए मजबूर कर दिया था । फिर शादी के बाद शर्मीला ने शुभम का जो रूप देखा, ऐसा उसने कभी सपने में भी न देखा था ।

कुछ दिनों में ही शर्मीला फिर से स्वस्थ हो गई थी, पर भीतर से टूट चुकी थी । उसने ठान लिया था, कुछ भी हो, अब ससुराल नहीं जाएगी । पिछले महीने, शादी के कुछ दिन बाद जब मायके आई थी, गुमसुम सी लग रही थी । हमेशा हँसती रहने वाली शर्मीला बुझे-बुझे से चेहरे के साथ ऐसे लग रही थी जैसे कई दिनों से बीमार हो । उसे उदास देख कर पापा के पूछने पर ख़ुश दिखने का मुखौटा ओड़ लेती और माँ को भी ऐसे ही टाल देती थी । यह शादी करके अपने पाँव पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी जो मार ली थी । शुभम द्वारा शादी से पहले किए वो क़समें और वादे याद करके उसे आज ख़ुद के फ़ैसले पर बहुत ग़ुस्सा आ रहा था ।

शर्मीला को याद आ रही थी शादी की वो पहली रात, कितने सपनीले से अरमान लेकर वो ससुराल गई थी । मिलन की प्रथम रात को सजधज कर उसका इन्तज़ार करती रही । देर रात तक इन्तज़ार करते-करते न जाने कब आँख लग गई थी उसकी । तब बाहर किसी के ज़ोर ज़ोर से बोलने की आवाज़ सुन कर उसकी नींद खुल गई थी । शुभम लड़खड़ाते क़दमों से अन्दर आते ही बहकती आवाज में उसे डाँटने लगे थे और कहने लगे थे, "तू अभी तक सोई क्यों नही, सो जा । " इतना कह कर बिस्तर पर लुढ़क गए और खर्राटे मारने लग पड़े थे। शराब पीकर बेसुध पड़े थे । वो कितनी उतावली थी, अपने साजन की बाहों में सिमट जाने को । सुहाग की सेज फूलों की नहीं, काँटों की शैय्या लगने लगी थी । यह क्या हो गया है ? पहले कभी भी इस हाल में उन्हे नहीं देखा था । ये सब देख कर उसकी आँखों से अश्रुधाराएं बह निकली थी । अगली चार-पाँच रातों में भी शुभम का रवैया वैसा ही रहा । शर्मीला दिन भर सब लोगों के सामने दिखावा सा करती रहती और हर रात को वो आस लगाए रहती कि शुभम आज तो ज़रूर उसके क़रीब आएगा । शुभम को कुछ भी कहने का साहस वो जुटा नहीं पा रही थी। आँखों में आँसू  भर कर भी मुस्कराहट ही विखेरती थी,इस तरह सभी को ख़ुश ही नज़र आती थी । जब दिल चाहे छुप-छुप कर रो लेती थी । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि शुभम ऐसा क्यों कर रहा था । हर रोज़ रात को दोस्तों संग पार्टियों में बैठ कर शराब पीना और देर रात लौट कर शर्मीला से बातचीत किए बग़ैर सो जाना, ऐसा ही कई दिनों तक चला।

शर्मीला के ससुराल के सभी लोग शुभम की बुरी आदतों के बारे में पहले से ही भली-भाँति जानते थे,पर अफ़सोस कि घर वाले फिर भी उसी की तरफ़दारी करते । धीरे-धीरे शर्मीला को घर के सभी सदस्यों का रवैया समझ में आने लगा । एक दिन ससुर जी को उसने सास से बतियाते सुन लिया था । वो उससे कह रहे थे," बहुत उम्मीद दी इनसे अच्छा दहेज मिलने की, लेकिन यह तो कुछ भी ख़ास नहीं लेकर आई है, इसी बजह से शुभम उसके क़रीब नहीं जा रहा है।" यह सुन कर उसके सब्र का बाँध टूट चुका था, उसने ठान लिया कि आज चुप नहीं बैठेगी । शुभम को पूछ कर ही रहेगी कि दहेज की बात शादी से पहले क्यों नहीं तय कर ली गई थी । हर रोज़ की तरह उस रात को भी बात न हो सकी । रात भर शर्मीला सो नहीं सकी, सुबह को मौक़ा देख कर शुभम से दहेज के बारे में बातचीत हुई तो उसका जबाब सुन कर वो सुन्न होकर रह गई । उसका जबाब था "मैं तुमसे प्यार नहीं करता हूँ , बहुत धनवान घर देख कर लालच में तुमसे शादी करने के लिए तुम्हें फंसाया था, क्या दिया है दहेज में तेरे बाप ने ? भूल जाओ प्यार-व्यार की बातें, जाओ पहले अपने बाप से गाड़ी लेकर आओ ।

अगले ही दिन शर्मीला सास ससुर की इजाज़त लेकर अपने घर वापिस चली आई । बोझल क़दमों से घर में प्रवेश किया । शादी के कुछ दिन बाद ही, शर्मीला को अकेले घर आते देख उसके माँ बाप को हैरत हुई । उसके उतरे चेहरे को देख उसके पापा ने पूछ लिया," बेटा, क्या बात है, अकेले ही आई हो, शुभम साथ में क्यों नहीं आया है ? " प्यार से सिर पर हाथ रख कर अपने पास बिठाया तो शर्मीला अपने आँसू छिपा न सकी और फिर आँखों से गंगा-यमुना बहने लगी। उसने सारी बातें बता दी।
तब पापा ने कहा था, "बेटा, हम तो तुम्हें हमेशा बस ख़ुश ही देखना चाहते हैं, तुम्हारी ख़ुशी के लिए ही तो यह रिश्ता स्वीकार किया था। " फिर तुम्हारी ख़ुशी के सामने गाड़ी की क़ीमत कुछ भी नहीं । दो दिन बाद शुभम का जन्म दिन भी था इसलिए फ़ोन करके शर्मीला ने जन्म दिन वाले दिन ही उस को अपने घर बुला लिया था और कहा,"पापा ने कहा है, अपनी पसन्द की जो गाड़ी लेनी है, आकर देख लेना । "

शुभम मन ही मन में बहुत ख़ुश हो रहा था और सोच रहा था कि तीर निशाने पर लगा है । उसको भविष्य के लिए भी उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी थी, जब चाहे अगली डिमांड रख सकता था । अगले दिन का अवकाश लेकर वो ड्यूटी के बाद रात को शर्मीला के घर पहुँच गया था । उसके जन्म दिन पर उपहार के तौर पर उसकी पसन्द की नई गाड़ी पर ख़रीद कर दे दी गई थी । बस यही ग़लत फ़ैसला ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया था । पापा ने बेटी से कह दिया था कि इसके बाद कोई भी डिमांड स्वीकार नहीं करनी है । दोनों को ख़ुश देख कर शर्मीला के पापा को आत्मिक प्रसन्नता का अहसास हो रहा था क्योंकि वह अपनी बेटी को हर हाल में ख़ुश देखना चाहते थे । उसी दिन शाम को नई गाड़ी पर सवार होकर दोनों अपने घर जाने के लिए निकल पड़े थे । वो गर्मियों की सुरमई शाम दोनों के दिलों को मदहोश कर रही थी।। शुभम ने एकांत स्थान पर गाड़ी रोक ली और शर्मीला के हाथ को अपने हाथों में लेकर चूमने लग गया था । शुभम के स्पर्श से उसका दिल खिल उठा था । उसका दूसरा हाथ शर्मीला के बदन पर पहली बार थिरकने लगा था । उसकी इस हरकत से शर्मीला सिहर उठी थी । शुभम ने उसे हसरत भरी नज़रों से देखा तो शर्मीला का तन हौले हौले उस आग में पिघलने लगा था । पिछले कुछ दिनों से, जो ग़ुस्सा शर्मीला के मन में था,अब तक प्यार में बदल चुका था .. और इस तरह उस रात को
दो बदन एक हो गए थे ।

अचानक पदोन्नति के बाद शुभम का स्थानान्तरण बंगलौर में हो गया था। दो महीने के बाद जब बेंगलोर से घर आया तो शर्मीला के सामने एक और महँगे उपहार की फरमाईश रख दी । उसे टालने के लिए उसने कह दिया था, "पापा से बात करूँगी ।"
उसके वापिस चले जाने पर पापा से इस बारे में बात हुई तो उन्होने फ़ैसला किया कि अब उनकी किसी तरह की, कोई भी माँग पूरी नहीं करेंगे । शुभम बैंगलोर से फ़ोन करके इस बारे में बार-बार पूछता रहता था । तब शर्मीला ने कह दिया था कि पापा और कुछ नहीं दे सकते । उसके बाद उसके फ़ोन आने बंद हो गए थे । पहले तो वो घर भी जल्दी जल्दी आ जाया करते, लेकिन अब शर्मीला को उनका इन्तज़ार करते करते कई महीने गुज़र जाते थे । इधर ससुराल घर में, शर्मीला को रोज़-रोज़ कई प्रकार के ताने सुनने को मिलने लगे थे । घर मे, उसे अपना खाना भी अलग बनाने को कहने लगे थे ।

फिर अचानक एक दिन ससुराल में उसकी सास ने जो कहा, उसको सुन कर तो शर्मीला के पैरों तले की जैसे ज़मीन ही खिसक गई थी । उसने कहा,"शुभम ने बैंगलोर में किसी दूसरी लड़की से शादी कर ली है । उस लड़की ने दहेज में एक बड़ी रक़म नक़द दी है और वो नौकरी भी करती है । अब शुभम का इन्तज़ार न करो । चली जाओ अपने बाप के घर । "वो उस रात भर सो न सकी और सारी रात रो-रो कर उसका बुरा हाल हो गया था । सुबह होते ही बिना किसी से बातचीत किए, अपने माँ-बाप के घर चली आई थी । एक शादीशुदा औरत के लिए यह एक बहुत बड़ा सदमा होता है । उसके लिए यह बर्दाश्त से बाहर था । शर्मीला के भाई ने किसी जानकार सूत्र से शुभम की दूसरी शादी के बारे में पुष्टी भी कर ली थी । शर्मीला इस सदमें से उभर नहीं पा रही थी, वो इतनी टूट चुकी थी कि अब जीना नहीं चाहती थी । रात भर सो न पाई थी । सभी जानते थे कि उसने यह शादी अपनी ज़िद पर अड़ कर की थी, इसलिए अब किसको दोषी कहे । सुबह होने वाली थी, तब उसने अपने बायें हाथ की नस काट ली । ज़्यादा ख़ून बहने से जान पर ख़तरा बन गया था । समय पर पास के अस्पताल में ले गए थे, तब इस तरह से शर्मीला को बचाया जा सका था । अस्पताल में जाँच के दौरान यह भी पता चला था कि वो एक बच्चे की माँ बनने वाली है ।

शर्मीला को मर्द नाम के जानवर से अब नफ़रत सी होने लग गई थी । उसे सब मर्द एक ही जैसे लगने लगे थे । इसीलिए पापा के बार-बार कहने पर भी दूसरी शादी न करने पर अटल थी । वो आज़ाद होकर, खुले वातावरण में ऊँची परवाज़ भरना चाहती थी । वो ठान चुकी थी कि उसे कोई अच्छी नौकरी हासिल करके ख़ुद अपने पैरों पर खड़े होना है और अपने पेट में पल रहे बच्चे की परवरिश बहुत अच्छे ढंग से करनी है । सच्चे दिल से मेहनत करने वालों पर उपर वाले की रहमत ज़रूर होती है ।

शर्मीला को बैंक में नौकरी मिल जाती है और उसके आठ महीने बाद बेटे का जन्म होता है उनके घर । प्रभु ने इतना कुछ दे दिया था कि धीरे-धीरे दुख के बादल छँटने लगे थे पर जीवन पर्यन्त एक टीस सी दिल में हमेशा के लिए घर कर गई थी ।

शर्मीला के माँ-बाप ने शुभम के विरुद्ध अदालत में दहेज प्रताड़ना और बिना तलाक़ लिए दूसरी शादी करने का केस फ़ाईल करवा दिया था, शुभम के तारीख़ पर पेश न होने के कारण पैंडिंग चल रहा था । पता चला था कि वह विना शर्त फिर से उसे अपनाना चाहता था । लेकिन शर्मीला को किसी भी सूरत में अब शुभम फिर से स्वीकार नहीं था । वो स्वाभिमान को फिर से नहीं खोना चाहती थी । ख़ुद को पहचान चुकी थी । कितनी देर से जिस दिन का उसे इन्तज़ार था, वो फ़ैसले की घड़ी अब आ गई थी ......शुभम को सज़ा हो गई और उसकी दूसरी पत्नी भी उसे पहले ही छोड़ कर चली गई थी...मगर शर्मीला शुभम को इस हालत में देख कर भी खुश भी थी, पर भीतर तक एक टीस सी महसूस हो रही थी .. शुभम को इस हाल में देख कर ।

क्योंकि यह वही शुभम था, जिसको कभी वो जी जान से प्यार करती थी।

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